Thursday, June 10, 2010

नज्म : खुदा

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कब वो खुदा, एक बार इधर देखता होगा ।
शब भर कोई, सवाल यह सोचता होगा॥

अपनी हालत पर आज, दुआ करें तो किससे ।
वो भी आजकल,खुद से दुआ करता होगा ॥

हमारे आसुओं की आज, औकात क्या है ।
वो भी आजकल, छुप छुप के रोता होगा॥

तकदीर में लिखा क्या, यह पूछें किससे ।
वो भी तकदीर अपनी, आज कोसता होगा ॥

अपने कर्मों का हिसाब, अब देंगे किसे हम।
उससे भी अब कोई , हिसाब माँगता होगा॥

बेकार है अभिमन्यु अब, खुदा को ढुँढ्ना ।
वो भी आजकल, एक और खुदा ढुँढ्ता होगा॥

नज्म : वो कौन हैं

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वो कौन हैं जो कहते हैं, कि प्यार नहीं देखा है ।
झुकी झुकी नजरों से ताकते, हमने भी देखा है॥

वो कौन हैं जो कहते हैं, कि दर्द नहीं ।
सिसकियों को छुपाते, हमने भी देखा है ॥

वो कौन हैं जो कहते हैं, कि खुदा नहीं।
छुप-छुप के हाथ उठाते, हमने भी देखा है ॥

वो कौन हैं जो कहते हैं, कि गरीब नहीं ।
सुकून के लिये तड्पते, हमने भी देखा है॥

वो कौन हैं जो कहते हैं, कि कुछ भी नहीं।
शान से जीते, हमने भी देखा है॥

Sunday, June 6, 2010

नज्म : जिंन्दगी का सफ़र

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तेरा प्यार मेरे लिये, खुदा हो गया ।
क्या था मैं कल, आज क्या हो गया ॥

नफ़रत की दुनिया, मतलब के रिश्ते ।
मुहब्बत का दामन, फिर जुदा हो गया ॥

महफिलें ये अब तो, सजती नहीं हैं ।
यारों की दुनिया में, बदनाम हो गया ॥

तन्हा जिन्दगी का सफ़र, कटता नहीं होगा ।
लुट लुट कर जीना, आसन हो गया ॥

खुद को जला, अभिमन्यु शमा बन गया ।
राख के ढेरों पर आज, हिमालय खडा़ हो गया ॥

नज्म : यादें

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काम में, तमाम ज़िन्दिगी कट जाती है |
तन्हाई में उनकी याद, और उभर आती है ||

उन्होने न वफ़ा की, न बेवफ़ाई हमसे |
अपने को छुपाकर भी, परछाई नज़र आती है ||

दिल में दर्द, चेहरे पर तबस्सुम की लकीर |
किसी को पाने या खोने से, ज़िन्दगी बदल जाती है ||

बिछड्ती मंजिलों की ओर, हसरत भरी निगाहें |
कुछ न कर पाने पर, असहाय नज़र आती है ||

समय असमय, पुराने जख्मो की मीठी चुभन |
हमारी कहानी नई सी, नज़र आती है ||

प्रथम सम्मोहन की चिर स्म्रति |
तन्हाई में उनकी याद, और उभर आती है ||

कविता : ख्वाब

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रफ़्तार


सोचता हूँ वो इंतज़ार करती होगी,
अपने आप से बातें दो चार करती होगी ।
छुप छुप कर अकेले में अपने रूप को,
आईने में निहारती सवाँरती हर शाम होगी ॥

दिल की धड़कन उसकी मेरी गुलाम होगी,
खवाब से मेरे हर रात वो परेशान होगी ।
मिलन का ख्वाब भोर में देखकर,
सखियों से शरमाकर वो लाल होगी ॥

तमाम रातें वो मेरे नाम करती होगी,
या खुदा मुझे बदनाम करती होगी ।
सोच रहा हूँ मीलों दूर बैठा में,
मुझ पर वो सौ सौ बार मरती होगी ॥

नज्म : अंजाम

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न कोई खत, न कोई खबर
मिलता रहा हूँ उनसे, खुद से बेखबर |

किसे दूं आवाज, किसको बुलाऊँ मैं पास
चाहत के पैमाने में, शब्द हुए बेअसर |

इन वादियों में तुझको, मै ढूंढ़ रहा
छुपा के दिल में, किसी को बेनजर |

ख्वाबों की इबाद्त तो, की थी हमने
अब खुदा का नाम लूं, या पुकारूं ईश्वर |

न कोई गम, न शिकवा ए मंजर
चाहतों को उसने, यही अंजाम दिया अक्सर |

कविता : तुम कहो … बस एक बार…

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चलते-चलते हर राह, हर मोड पर
कभी किसी ने कुछ कहा, कुछ पूछा ।
हर बात पर, जगह जगह टोका गया
कभी नाम, तो कभी बदनाम हुआ ।
जीता रहा, बस एक इस इच्छा से
काश, कभी तुम भी कुछ कहो ।
अधिकार से कभी, कुछ पूछो
कभी तो किसी बात पर, टोक दो ।
मुझ से कोई तो, सवाल करो
कभी तो, मुझसे जवाब मांगो ।
कभी मुझे, मेरे नाम से पुकारो
मौका दो, अपने जीवन में झाँकने का ।
धकेल दो वो, बरसों से बन्द दरवाजे
आ जाने दो मुझे अंदर, ताजी हवा के साथ ।
लग जाने दो मुझे, अपने सीने से
समां लेने दो मुझे, अपनी सांसों में ।
बस कह दो एक बार, पहली और आखिरी बार
तुम मेरे थे, तुम मेरे हो ।
उन शब्दों को हमसफ़र बना, सहारे से
हम करें इन्तजार अगले जन्म तक, जन्मों जन्मों तक ।