Thursday, September 3, 2009

नज्म : नई दुनिया

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


जब भी खुद को तन्हा पाईये ।
लंबी कतारों में खड़े हो जाईये ॥

शौक है अगर ताकत आजमाने का ।
जा पत्थरों से आज सर टकराईये ॥

आज मौसम की पहली बारिश है ।
पाप अपने भी कुछ बहा आईये ॥

खुशबू फ़ूलों की आज चुरा ली किसने ।
चाँद तारों से नया गुलिस्तां सजाइये ॥

बेकार है अभिमन्यु रोशनी की तलाश ।
अंधेरों में एक नई दुनिया बसाइये ॥

5 comments:

  1. अभिमन्यु जी,

    वाकई एक उम्दा गज़ल।

    -प्रत्यूष गर्ग

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