

ब्रज की होली खेल, हुआ हाल बेहाल ।
गुल्फ़ाम जी हो गये, नीचे से ऊपर लाल ॥
बीच भवर में घिर गये, आगे कुआं पीछे खाई ।
चारों तरफ़ चक्रव्यूह, सी रचना पाई ॥
बच-बचाकर किसी तरह, भागे घर के अंदर ।
देख आईना चकराये, देखा जैसे बंदर ॥
बार – बार साबुन से, मुंह धोकर आते ।
फिर भी खुद को जैसे, पहचान न पाते ॥
तभी सामने से एक ब्रजबाला आ टकरायी ।
देख यूं हाल उनका, मंद मंद मुसकायी ॥
गुल्फ़ाम जी को प्यार के, रंगों से उसने नहलाया ।
लगा स्वर्ग जैसे, धरती पर उतर आया ॥
पडी चन्द्र्मा पर, अचानक काली छाय़ा ।
चन्द्रग्रहण थी श्रीमतीजी, डंडा नज़र आया ॥
हडबडाकर भागे, दरवाजे से जा टकराये ।
टूट गया था सपना, आह – आह चिल्लाये ॥
श्रीमतीजी भागकर, किचन से बाहर आयीं ।
माथा पकड्कर बैठ गयीं, रोयी और चिल्लायीं ॥
सपने में भी क्या, रंग रंग चिल्लाते हो ।
सोते – सोते घर का, पूरा चक्कर लगाते हो ॥
गुलफाम जी को मामला, कुछ समझ न आया ।
बोले "भाग्यवांन", आपने यह क्या फरमाया ॥
मैं तो सारे चक्कर - वक्कर, था तभी छोड़ आया ।
साथ तुम्हारे जब, सातवाँ चक्कर था लगाया ॥
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